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बेटी बचाओ, देश बचाओ: नन्ही रोशनी और उसके सपनों की उड़ान

पढ़िए 'सूर्यपुर' की नन्ही रोशनी की एक प्रेरक कहानी, जिसने अपनी मेहनत और बुद्धिमानी से साबित किया कि बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि देश का गौरव होती हैं। बच्चों के लिए एक बेहतरीन सीख।

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उज्ज्वल भविष्य की नींव

किसी भी देश की उन्नति उस देश की बेटियों की खुशहाली और शिक्षा पर निर्भर करती है। "बेटी बचाओ, देश बचाओ" केवल एक नारा नहीं है, बल्कि एक समृद्ध राष्ट्र के निर्माण का मूल मंत्र है। जब एक बेटी पढ़ती है, तो वह न केवल अपना घर संवारती है, बल्कि पूरे समाज और देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाती है। यह कहानी 'सूर्यपुर' नामक एक छोटे से गाँव की है, जहाँ एक नन्ही बच्ची ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से न केवल अपने गाँव की सोच बदली, बल्कि पूरे देश के सामने एक मिसाल पेश की।

सूर्यपुर की पुरानी सोच और एक नई उम्मीद

पहाड़ों की तलहटी में बसा 'सूर्यपुर' एक बहुत ही शांत और सुंदर गाँव था। यहाँ के लोग मेहनती थे, लेकिन उनकी सोच पुराने ज़माने की थी। गाँव के ज्यादातर लोगों का मानना था कि लड़कों को पढ़ाना चाहिए ताकि वे बुढ़ापे का सहारा बनें, और लड़कियों को केवल घर का काम सिखाना चाहिए।

इसी गाँव में रोशनी नाम की एक आठ साल की लड़की रहती थी। रोशनी के पिता, रामदीन, एक किसान थे और माँ, कमला, घर का काम संभालती थीं। रोशनी का एक छोटा भाई भी था, गोलू। गोलू को स्कूल भेजा जाता था, जबकि रोशनी को घर पर रहकर अपनी माँ की मदद करने और गोलू का ख्याल रखने के लिए कहा जाता था।

रोशनी की आँखों में हमेशा एक चमक रहती थी। जब भी वह गोलू को स्कूल जाते देखती, उसका मन भी बस्ता उठाकर पाठशाला जाने को करता। वह छुप-छुपकर गोलू की किताबों को देखती और उन चित्रों के माध्यम से दुनिया को समझने की कोशिश करती।

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दादाजी का साथ और रोशनी की पहली जीत

रोशनी के दादाजी गाँव के सबसे पुराने और समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने रोशनी की तड़प को पहचान लिया था। एक दिन जब रोशनी उदास बैठी थी, दादाजी ने उसके पास आकर कहा, "बिटिया, क्या हुआ? तुम्हारी आँखों की चमक आज फीकी क्यों है?"

रोशनी ने सुबकते हुए कहा, "दादाजी, क्या मैं कभी पढ़ नहीं पाऊंगी? क्या बेटियाँ सिर्फ घर साफ करने के लिए ही पैदा होती हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "नहीं रोशनी, तुम तो वह सूरज हो जो पूरे सूर्यपुर को रोशन करेगा। मैं तुम्हारे पिता से बात करूँगा।"

दादाजी के समझाने पर और रोशनी की अटूट लगन को देखकर रामदीन ने भारी मन से उसे स्कूल भेजने का फैसला किया। रोशनी के लिए वह दिन उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन था। उसने अपनी पुरानी किताबों को साफ किया और खुशी-खुशी पाठशाला की ओर दौड़ पड़ी।

स्कूल का संघर्ष और रोशनी का आविष्कार

स्कूल जाना रोशनी के लिए आसान नहीं था। गाँव के कुछ लोग ताना मारते थे, "लड़की पढ़-लिखकर क्या करेगी? आखिर जाना तो दूसरे घर ही है।" लेकिन रोशनी ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। वह अपनी कक्षा में सबसे तेज़ छात्रा बन गई। उसे विज्ञान और गणित में बहुत रुचि थी।

गाँव में एक बड़ी समस्या थी—बिजली की कमी। रात होते ही पूरा गाँव अंधेरे में डूब जाता था। बच्चे पढ़ नहीं पाते थे और रात में खेतों में पानी देना भी मुश्किल हो जाता था। रोशनी ने ठान लिया कि वह इस समस्या का कोई समाधान निकालेगी।

उसने अपने विज्ञान शिक्षक की मदद से 'सौर ऊर्जा' (Solar Energy) के बारे में पढ़ा। उसने कचरे से पुरानी बैटरी, टूटी हुई तारें और कुछ सौर सेल (Solar Cells) इकट्ठे किए। कई रातों तक वह जागकर एक छोटा सा सौर-लैंप (Solar Lamp) बनाने की कोशिश करती रही।

जब गाँव में आया 'रोशनी' का उजाला

एक दिन सूर्यपुर में एक बड़ा उत्सव था। अचानक गाँव का ट्रांसफार्मर फूँक गया और चारों तरफ गहरा अंधेरा छा गया। लोग परेशान हो गए। तभी रोशनी अपनी बनाई हुई मशीन लेकर बीच चौराहे पर आई।

उसने अपनी छोटी सी सौर-पट्टी को एक ऊँचे खंभे पर लगाया और बटन दबा दिया। पलक झपकते ही पूरा चौराहा दूधिया रोशनी से जगमगा उठा। लोग दंग रह गए। वह छोटी सी रोशनी किसी चमत्कार से कम नहीं थी।

गाँव के सरपंच जी ने आगे बढ़कर पूछा, "बेटा रोशनी, यह क्या है?"

रोशनी ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, "सरपंच जी, यह सूरज की शक्ति है। अगर हम बेटियों को पढ़ने का मौका दें, तो हम ऐसे हज़ारों सूरज घर-घर में जला सकते हैं। बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि उजाला होती हैं।"

राज्य स्तरीय प्रतियोगिता और देश का गौरव

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रोशनी की इस छोटी सी कोशिश की खबर धीरे-धीरे जिले और फिर राज्य तक पहुँच गई। उसे राज्य स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी के लिए चुना गया। रोशनी ने वहां अपना 'सस्ता सौर सिंचाई मॉडल' पेश किया, जो कम खर्च में किसानों के खेतों तक पानी पहुँचा सकता था।

उसका मॉडल पूरे राज्य में प्रथम आया। मुख्यमंत्री जी ने उसे सम्मानित करते हुए कहा, "रोशनी ने आज यह साबित कर दिया कि 'बेटी बचाओ, देश बचाओ' केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक सच्चाई है। अगर आज रोशनी नहीं पढ़ी होती, तो शायद सूर्यपुर आज भी अंधेरे में होता।"

रोशनी को छात्रवृत्ति मिली और उसे आगे की पढ़ाई के लिए बड़े शहर के कॉलेज में प्रवेश मिला। गाँव के वही लोग जो पहले ताना मारते थे, आज अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए कतार में खड़े थे। सूर्यपुर अब बदल चुका था।

निष्कर्ष: बेटियाँ ही भविष्य हैं

आज रोशनी एक बड़ी वैज्ञानिक बन चुकी है और देश के लिए सौर ऊर्जा के बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है। उसने अपने गाँव सूर्यपुर को एक 'स्मार्ट विलेज' बना दिया है जहाँ हर घर में बिजली है और हर बेटी स्कूल जाती है।

रोशनी की कहानी हमें सिखाती है कि बेटियों के पास वह शक्ति है जो न केवल एक परिवार को, बल्कि पूरे देश को बदल सकती है। हमें बस उन्हें एक मौका, थोड़ा सा विश्वास और शिक्षा का हथियार देना है।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

यह कहानी हमें सिखाती है कि "बेटियाँ हमारे देश का अनमोल धन हैं।" शिक्षा पर केवल लड़कों का हक नहीं है; जब एक बेटी पढ़ती है, तो वह पूरे समाज की सोच को बदल देती है। हमें बेटियों को बचाने, उन्हें पढ़ाने और उनके सपनों को सच करने में मदद करनी चाहिए क्योंकि एक सशक्त बेटी ही एक सशक्त राष्ट्र की पहचान है।

भारत सरकार के इस महत्वपूर्ण अभियान के बारे में और अधिक जानने के लिए आप बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ - विकिपीडिया देख सकते हैं। 

Tags : bachon ki moral story 

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